गोरखपुर में नया खेल: सिर्फ ‘कब्जे’ पर रजिस्ट्री जायज, तो हर किराएदार बन जाएगा मकान मालिक!

कलेक्ट्रेट हलचल: गोरखपुर रजिस्ट्री दफ्तर में ‘निबंधन नियमावली’ तार-तार; RTI में सब-रजिस्ट्रार का आत्मघाती कबूलनामा!

गोरखपुर (वेब डेस्क): उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1 फरवरी 2026 से लागू की गई नई सख्त भू-निबंधन नियमावली को ठेंगा दिखाते हुए गोरखपुर के सब-रजिस्ट्रार (द्वितीय) कार्यालय में एक ऐसा गंभीर मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। बिना विधिक स्वामित्व (Title Chain) और बिना दाखिल-खारिज (Mutation) के, सिर्फ ‘मौखिक बयानों और कब्जे’ के नाम पर एक कीमती व्यावसायिक भूखंड के प्रथम तल की ‘गिफ्ट डीड’ (उपहार विलेख) पंजीकृत कर दी गई।

इस पूरे फर्जीवाड़े का सबसे चौंकाने वाला खुलासा स्वयं सब-रजिस्ट्रार ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत दी गई अपनी लिखित आख्या में किया है, जो अब विभागीय जांच के घेरे में आ गया है।


रजिस्ट्री दफ्तर का ‘आत्मघाती’ यू-टर्न: गोरखपुर में बिना कागजात सिर्फ बयानों पर हो रही जमीनों की रजिस्ट्री?

क्या है पूरा मामला और विधिक विवाद?

मामला शहर के कुनराघाट क्षेत्र स्थित एक बहुमंजिला इमारत के प्रथम तल (क्षेत्रफल 840 वर्ग फीट) से जुड़ा है। इस संपत्ति के असली मालिकाना हक को लेकर वरिष्ठ दीवानी न्यायालय (Senior Division Civil Court) में वर्ष 2008 सेवाद संख्या 228/2008′ लंबित है

इस लंबित मुकदमे के दौरान ही, विपक्ष के एक कथित अध्यासी अमरनाथ‘ (काल्पनिक नाम) ने न्यायालय की अवहेलना करते हुए इस विवादित संपत्ति को अपने पुत्र विजय और पुत्रवधू सरिता के नाम गुपचुप तरीके से ‘गिफ्ट डीड’ (दिनांक 23/04/2026) कर दिया।


गिफ्ट डीड में पकड़ी गईं 4 सबसे बड़ी प्रलेखीय जालसाजियां:

जब पीड़ित पक्ष रमेश कुमार‘ (काल्पनिक नाम) को इस गुप्त रजिस्ट्री की भनक लगी, तो उन्होंने दस्तावेजों की पड़ताल की, जिसमें सीधे तौर पर आपराधिक जालसाजी के निम्नलिखित साक्ष्य मिले:

  1. मकान नंबर की हेराफेरी (टैग नंबर 7, पृष्ठ 9): रजिस्ट्री में लगे GPS कैमरे के आधिकारिक फोटो वाले पेज पर साफ तौर पर मकान नंबर 122-B प्रदर्शित हो रहा है (जिसका नगर निगम का हाउस टैक्स प्रार्थी रमेश कुमार के परिवार द्वारा जमा किया जाता है)। लेकिन विधिक हेराफेरी करने के इरादे से गिफ्ट डीड के मुख्य लेख में चालाकी से मकान नंबर 122 दर्ज कराया गया, ताकि संयुक्त संपत्ति पर अवैध कब्जा किया जा सके।
  2. चौहद्दी (Boundaries) छिपाने का अपराध (टैग नंबर 6, पृष्ठ 7): विलेख की चौहद्दी में पूर्व दिशा के वास्तविक हिस्सेदार का नाम जानबूझकर गायब कर दिया गया। रजिस्ट्री अधिकारियों की आंखों में धूल झोंकने के लिए वहां केवल मकान दीगर शख्स लिखवाया गया, जो कि कानूनन एक दंडनीय अपराध है।
  3. क्षेत्रफल का विरोधाभास: एक तरफ पूर्व के दस्तावेजों में अमरनाथ खुद स्वीकार करता है कि प्रथम तल पर उसका हिस्सा मात्र 848.5 वर्ग फीट है, वहीं इस नई गिफ्ट डीड में उसने पूरे प्रथम तल का क्षेत्रफल 1680 वर्ग फीट दर्शाकर दान कर दिया। एक ही सब-रजिस्ट्रार दफ्तर में दो परस्पर विरोधी कूट-रचित दस्तावेज दर्ज हो गए।
  4. बाहरी और फर्जी गवाहों का जाल: इस पूरी जालसाजी को पुख्ता करने के लिए जिन गवाहों के हस्ताक्षर कराए गए, वे स्थानीय नहीं हैं। गवाहों में मुख्य रूप से दान पाने वाली महिला के सगे भाई (निवासी जनपद बस्ती) और साढ़ू (निवासी जनपद लखनऊ) शामिल हैं, जिन्होंने सरकारी अधिकारियों के समक्ष झूठा सत्यापन किया।

यूपी निबंधन नियमावली 2026 और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना

इस मामले में सबसे बड़ा विधिक सवाल निबंधन विभाग की कार्यप्रणाली पर खड़ा होता है। सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम की धारा 52 (Lis Pendens) के अनुसार, जब कोई मामला न्यायालय में विचाराधीन हो, तब संपत्ति के स्वरूप में बदलाव या उसका हस्तांतरण पूर्णतः प्रतिबंधित और शून्य होता है।

इसके अलावा, उत्तर प्रदेश सरकार के नए नियम 2026 के तहत बिना खतौनी/राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज हुए (बिना म्यूटेशन के) कोई भी उप-निबंधक रजिस्ट्री नहीं कर सकता। लेकिन आरटीआई के जवाब में सब-रजिस्ट्रार ने गैर-जिम्मेदाराना रुख अपनाते हुए लिखा कि— वे सिर्फ क्रेता, विक्रेता और गवाहों के बयानों के आधार पर रजिस्ट्री करते हैं, उनके पास स्वामित्व का कोई भौतिक सबूत नहीं है।


आरटीआई दफ्तर का संदेहास्पद खेल और प्रथम अपील

पीड़ित पक्ष को जो आरटीआई के जवाब भेजे गए, वे बेहद संदेहास्पद हैं। विभाग द्वारा भेजे गए आधिकारिक पत्रों और लिफाफों पर न तो सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर हैं, न ही विभाग की राजकीय सील और स्टैम्प है। बिना सील-स्टैम्प और बिना सरकारी डाक टिकट के पत्रों का प्रेषण यह दर्शाता है कि विभागीय अमला अपराधियों को बचाने के लिए तथ्यों को छिपाने का प्रयास कर रहा था।

एडीएम (ADM) कोर्ट ने लिया कड़ा संज्ञान

इस भारी विलेखीय जालसाजी और विभागीय लापरवाही को लेकर पीड़ित रमेश कुमार ने जिला निबंधक / सहायक महानिरीक्षक निबंधन (प्रथम अपील अधिकारी) के समक्ष कड़ा विरोध दर्ज कराया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रथम अपील अधिकारी ने डिस्पैच नंबर 125 जारी करते हुए आगामी 13 जुलाई 2026 को प्रथम अपील की सुनवाई नियत की है।

चूंकि इसी संपत्ति का मूल टाइटल सूट भी सिविल कोर्ट में 13 जुलाई को ही लगा है, इसलिए प्रार्थी ने निबंधन अधिकारी को अपना विस्तृत विधिक लिखित कथन (Written Statement) सौंप दिया है। कानून के जानकारों का मानना है कि नए नियम 2026 और सुप्रीम कोर्ट के सूरज लैम्प्स रूलिंग के आधार पर यह फर्जी गिफ्ट डीड किसी भी समय निरस्त हो जाएगी और फर्जी गवाहों सहित कूट-रचना करने वाले पूरे कुनबे को क्राइम ब्रांच या सीबीसीआईडी (CBCID) की जेल यात्रा करनी पड़ सकती है।

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