यह कहानी है धोखाधड़ी, फर्जीवाड़े—
जो आपको हिला कर रख देगी…क्या हर मामला सच में सिर्फ दीवानी अदालत होता है? या फिर कई बार इसके पीछे छुपा होता है एक बड़ा आपराधिक खेल? पहले अदालत में श्याम ने अदालत में कहा कि राम की पत्नी विदोत्तमा राम की संपत्ति की कानूनी संरक्षक हैं, लेकिन दूसरे अदालत में श्याम ने अदालत में कहा कि राम का बेटा सोनू ही राम की संपत्ति का कानूनी संरक्षक है? क्या दोनों या केवल एक ही सही है? श्याम ने गलत बयान क्यों दिया? क्या इस मामले में पुलिस को कार्रवाई करने का अधिकार है?
जब कागजों में सब साफ दिख रहा है,
तो फिर पुलिस कार्रवाई क्यों नहीं करती? एक सच्ची घटना पर आधारित कहानी सुनते हैं गोरखपुर की एक संयुक्त संपत्ति की कहानी…दो भाई — राम और श्याम। दोनों के पास एक संयुक्त संपत्ति थी और परिवार शांतिपूर्वक जीवन जी रहा था।लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था… लगभग 35 साल की उम्र में राम की मृत्यु हो गई। पीछे छूट गए — उनकी पत्नी विदोत्तमा, दो बेटियाँ और एक 5 साल का बेटा सोनू।
यहाँ से शुरू होता है खेल…राम का भाई श्याम,वर्ष 2004 में श्याम अदालत से एक प्रमाण पत्र हासिल करता है — जिसमें दावा किया जाता है कि राम ने एक वसीयत (Will) के जरिए अपनी आधी संपत्ति श्याम के नाम कर दी थी। यानी आधी संपत्ति पर श्याम का कब्ज़ा हो गया। अगर श्याम के पास आधी संपत्ति पहले से थी,दूसरी चाल — और भी खतरनाक…राम के अवशेष आधे संपत्ति के बज़ाये ,उनके पुत्र सोनूसे राम के पुरे संपत्ति का Sale- agreement कराने के अवश्यता श्याम कोक्यों पड़ी,कौन सा डर हैं । क्या पहले जो कब्ज़ा किये थे, वो क्या फर्ज़ी तरीके से कब्ज़ा किये थे ? वर्ष 2006 में, जब सोनू अपनी माँ के साथ वापस गोरखपुर आता है…
एक दिन मौका पाकर, श्याम अपने ही भतीजे सोनू पर दबाव बनाता है और उससे जबरन एक Sale Agreement लिखवा लेता है — जिसमें सोनू अपने पिता राम की पूरी संपत्ति श्याम को बेचने की बात लिख देता है! अब कहानी लेती है बड़ा मोड़… एक तरफ श्याम पहले ही वसीयत के जरिए आधी संपत्ति ले चुका था सवाल उठता
अगर सब कुछ सही और कानूनी था,
तो फिर ये दूसरी चाल क्यों चली गई? “कोर्ट फाइल गायब!”इस मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि वसीयत से जुड़े पहले केस की पूरी फाइल कोर्ट रिकॉर्ड रूम से गायब बताई जा रही है क्या यह महज संयोग है? या फिर सबूत मिटाने की साजिश? जनता से सीधे सवाल… पुलिस को जांच करके यह तय करना चाहिए कि कौन सही है और कौन गलत? क्या ऐसे मामलों में इतना लंबा समय लगना चाहिए? जब कागजों में सब साफ दिख रहा है,तो फिर पुलिस कार्रवाई क्यों नहीं करती? अब असली सवाल आपसे…क्या यह मामला सिर्फ दीवानी अदालत (Civil) है? या इसमें शामिल हैं गंभीर आपराधिक अपराध जैसे:धोखाधड़ी दबाव डालकर एग्रीमेंट कराना फर्जी वसीयत साक्ष्य मिटाना कमेंट में जरूर बताएं — आपकी क्या राय है? अगर श्याम को आधी संपत्ति मिल चुकी थी, तो पूरी संपत्ति के लिए दबाव क्यों बनाया? क्या सोनू से कराया गया एग्रीमेंट वैध माना जाएगा? कोर्ट की फाइल गायब होना — क्या यह साधारण घटना है या साजिश?क्या पुलिस को इस मामले में तुरंत जांच करनी चाहिए? आपके हिसाब से — यह मामला दीवानी अदालत है या आपराधिक? अपनी राय खुलकर लिखें…क्योंकि कभी-कभी सच्चाई अदालत से पहले जनता के सामने आती है।




