पिछले दिनों बिहार में एनडीए को मिली बड़ी जीत ने चीजों को बदल दिया। नरेंद्र मोदी ने बिहार से बंगाल तक का इशारा किया। इससे कांग्रेस के सामने पश्चिम बंगाल के 2026 विधानसभा चुनाव को लेकर एक गंभीर दुविधा पैदा हो गई।
कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ रही हैं
2011 और 2016 की विधानसभाओं में कांग्रेस का कुछ अस्तित्व रहा था — 2016 में पार्टी ने 44 सीटें जीत ली थीं। लेकिन 2021 में सब कुछ उलट गया। 92 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद उसे एक भी सीट नहीं मिली और वोट शेयर करीब तीन प्रतिशत रह गया। कई पुराने कांग्रेस जिलों और कस्बों में टीएमसी और बीजेपी ने जगह बना ली- जैसे मयदाबाद और मालदा। इस गिरावट ने कांग्रेस को 2026 के लिए बड़ा सवाल दे दिया: क्या वह सिर्फ कुछ सीटों पर लड़ाई करे, वोट शेयर बढ़ाने की कोशिश करे, या अपना अस्तित्व बचाने पर जोर दे?
बीजेपी की प्रगति तेज हो रही है
2016 में सिर्फ तीन सीटें जीतने वाली बीजेपी ने 2021 में 77 सीटें ले लीं — जिससे वह बंगाल की मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई। 2019 के लोकसभा चुनावों में 42 में से 18 सीटें जीतने के बाद उसकी पकड़ और मजबूत हुई। बंगाल अब उसके लिए लगातार बढ़ता हुआ क्षेत्र बन चुका है। बिहार की ताज़ा जीत ने बीजेपी को बंगाल में अपनी ताकत आज़माने का अवसर दे दिया। पार्टी 2026 के लिए खुद को तैयार मान रही है।
टीएमसी और ममता बनर्जी की रणनीति
बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने कई बार स्पष्ट किया है कि 2026 में उनका दल अकेले चुनाव लड़ेगा। कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी के साथ सीट-बंटवारे का कोई इरादा नहीं है। 2021 में मिली 213 सीटों से आगे जाकर 2026 में दो-तिहाई बहुमत यानी 215 से ज्यादा सीटें हासिल करने का उनका लक्ष्य है। इससे स्पष्ट है कि टीएमसी बंगाल में अपना प्रभुत्व बनाए रखना चाहती है — और कांग्रेस के लिए उसके साथ तालमेल की संभावना बहुत कम है।
कांग्रेस की असली परेशानी — विरोधी कौन?
कांग्रेस अब दो मोर्चों के बीच फंस चुकी है। एक ओर बीजेपी है, जो बंगाल में तेजी से अपनी पकड़ मजबूत कर रही है — अगर उसे रोका नहीं गया, तो कांग्रेस का भविष्य संकट में पड़ सकता है। दूसरी ओर टीएमसी है — जो राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के गठबंधन-साझेदार हो सकती है, मगर बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने की जिद्द पर अड़ी है।




