जानें क्यों समाज की सोच और परवरिश में बदलाव कानून से ज्यादा जरूरी है।
नई दिल्ली: भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में महिलाओं की भागीदारी हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रही है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा रचित संविधान ने महिलाओं को पहले दिन से ही बराबरी का हक दिया, लेकिन आज 21वीं सदी में भी हम ‘महिला आरक्षण विधेयक’ (33% आरक्षण) जैसे विधायी हस्तक्षेपों पर निर्भर हैं। यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या संसद की सीटों का कोटा बदलने से समाज की सदियों पुरानी मानसिकता बदल जाएगी?
राजनीतिक भागीदारी: ‘हक‘ और ‘विरासत‘ का द्वंद्व
संविधान ने महिलाओं को चुनाव लड़ने से कभी नहीं रोका, फिर भी विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है। कड़वा सच यह है कि आज राजनीति में सक्रिय अधिकांश महिलाएं किसी न किसी राजनीतिक रसूख या पारिवारिक विरासत का प्रतिनिधित्व करती हैं।
- जमीनी हकीकत: स्वतंत्र पहचान और बिना किसी ‘गॉडफादर’ के सदन तक पहुँचने वाली महिलाएं आज भी अपवाद हैं।
- राजनीतिक दलों का दायित्व: यदि दल वास्तव में गंभीर हैं, तो उन्हें किसी संवैधानिक बाध्यता का इंतज़ार किए बिना, योग्यता के आधार पर महिलाओं को चुनावी टिकट देने चाहिए।
कागजों पर कानून, समाज में जड़ें
इतिहास गवाह है कि सामाजिक सुधार कानूनों से ज्यादा ‘इच्छाशक्ति’ से आए हैं। सौ साल पहले जब संसाधनों का अभाव था, तब भी समाज सुधारकों और पुरुषों ने महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए कंधे से कंधा मिलाया था।
“विकास तब शुरू होता है जब परिवार के भीतर महिलाएं एक-दूसरे की शक्ति बनती हैं।”
समाज में महिलाओं की प्रगति में अक्सर आपसी असुरक्षा, अहंकार और ईर्ष्या बाधक बनती है। यदि ये भावनात्मक बाधाएं दूर हो जाएं, तो समाज में तनाव और अपराध के आंकड़े स्वतः ही गिर जाएंगे।
परवरिश का अंतर: ‘राजकुमारी‘ बनाम ‘जिम्मेदार नागरिक‘
एक लड़की का भविष्य संसद भवन में नहीं, बल्कि उसके घर के आंगन में तय होता है। भारतीय समाज में आज भी एक बुनियादी कमी ‘परवरिश के तरीके’ में है:
- जीवन कौशल का अभाव: लड़कियों को अक्सर ‘पराया धन’ समझकर केवल लाड़-प्यार दिया जाता है, लेकिन उन्हें वित्तीय साक्षरता (Financial Literacy) और तनाव प्रबंधन नहीं सिखाया जाता।
- मानसिक तैयारी की कमी: शादी से पहले उसे दुनिया की जटिलताओं और जिम्मेदारियों के लिए तैयार करने के बजाय उसे एक काल्पनिक ‘राजकुमारी’ की तरह रखा जाता है, जिससे विवाह के बाद नए परिवेश में सामंजस्य बिठाना उसके लिए पहाड़ जैसा कठिन हो जाता है।
निष्कर्ष: शिक्षण ही असली सशक्तिकरण है
संविधान में संशोधन करना सरकार का प्रशासनिक कार्य हो सकता है, लेकिन वास्तविक परिवर्तन की जिम्मेदारी अभिभावकों और नागरिक समाज की है। आरक्षण केवल एक अवसर दे सकता है, लेकिन उस अवसर को निभाने की क्षमता केवल ‘सही परवरिश’ और ‘मानसिक स्वतंत्रता’ से आती है।
अंतिम शब्द: असली सशक्तिकरण आरक्षण के कोटे में नहीं, बल्कि उस शिक्षा और संस्कारों में है जो एक बेटी को जन्म से ही एक स्वतंत्र और संघर्षशील व्यक्तित्व के रूप में गढ़ते हैं।
संपादक की राय
यह लेख समाज की उस दुखती रग पर हाथ रखता है जिसे अक्सर राजनीतिक विमर्श में नजरअंदाज कर दिया जाता है। क्या आपको भी लगता है कि इसे प्राथमिक शिक्षा और पैरेंटिंग का उंसलिंग का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए? अपनी राय साझा करें।




