लेखक-पत्रकार प्रकाश चंद गुप्ता
हर जगह, हर समय पुलिस खुद को भगवान समझती है, उदाहरण अधिकतम है, अखबार भरा हुआ है लेकिन यह खबर अभी पूरी नहीं हुई है।पुलिस की भाषा नैतिक नहीं है, वे ऐसा दिखाते हैं मानो कानून या प्रशासन का उन पर कोई नियंत्रण नहीं है।यह बहुत दुखद है कि इसे नियंत्रित करने के लिए कोई कानून नहीं है। अगर कोई कानून है तो उसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा सकता? क्योंकि कानून तो प्रशिक्षण का विषय है। कानून का विषय वकीलों और आम जनता के ज्ञान के लिए है।कानून के ज्ञान की कमी के कारण अपराध संबंधी कानूनी मामलों की पुलिस प्रशासन में कई मामले लंबित हैं। कई मामलों में, कानून के ज्ञान की कमी के कारण, पुलिस प्रशासन अपराध के मामलों को हल नहीं कर पाती या खारिज कर देती है।मामले की सुनवाई अदालत में लंबित है और सबूतों पर आधारित आपराधिक मामला अभी लंबित है।लेकिन पुलिस द्वारा सबूत पेश किए गए। यदि पुलिस सही सबूत पेश नहीं करती है या अपूर्ण सबूत पेश करती है तो न्याय क्या है? इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है?अपराध दर शेयर मूल्य की तरह बढ़ रही है।इस मामले में पुलिस परिवार या रिश्तेदार भी पीड़ित होते हैं, लेकिन वे सबक नहीं सीखते, वे भी पीड़ित होते हैं।पुलिस विभाग कानून की पूरी जानकारी क्यों नहीं लेता या किसी अपराध के मामले में वकील की सलाह क्यों नहीं लेता? वे इसे निजी मामला नहीं मानते। वे इसे एक सामान्य मामला मानते हैं। काम को वे नौकरी की तरह लेते हैं।


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