नई दिल्ली — विशेष रिपोर्ट: सरकार की बिजली के निजीकरण और स्मार्ट मीटर लगाने की योजना को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं। आलोचकों का कहना है कि यह एक “जेबकतरे की चाल” जैसी है। उनका कहना है कि जब जनता का ध्यान राजनीतिक शोर-शराबे में भटका हुआ है, तब बिजली क्षेत्र में बड़े बदलाव चुपचाप किए जा रहे हैं — ऐसे बदलाव जो अंततः “जनता की जेब काट सकते हैं।”
नीति क्या प्रस्तावित करती है
सरकार खुदरा बिजली बाजार को निजी कंपनियों के लिए खोलने की योजना बना रही है। अब तक जहाँ एक ही सार्वजनिक बिजली बोर्ड घरों को बिजली सप्लाई करता था, वहीं अब कई निजी कंपनियाँ एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करेंगी। अलग-अलग घरों या मोहल्लों को अलग-अलग प्रदाता बिजली दे सकते हैं — ठीक वैसे ही जैसे केबल टीवी या इंटरनेट सेवाएँ काम करती हैं।
उपभोक्ता क्यों चिंतित हैं
स्मार्ट मीटर और निजीकरण का संयोजन उपभोक्ताओं के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है:
- स्मार्ट मीटर बिजली उपयोग का डेटा सीधे कंपनी के सर्वर पर भेजते हैं। ग्राहक खुद मीटर की रीडिंग की जाँच नहीं कर सकते, जिससे बढ़े हुए बिलों पर आपत्ति जताना मुश्किल हो जाता है।
- उत्तराखंड, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार सहित कई राज्यों में उपभोक्ताओं ने स्मार्ट मीटर लगाने के बाद भारी बिलिंग त्रुटियों की शिकायत की है।
- नैनीताल में एक उपभोक्ता, जो आमतौर पर ₹2,000 प्रति माह का बिल भरता था, उसे ₹47.9 लाख का बिल भेजा गया।
- पुणे और नोएडा में, उपभोक्ताओं के बिजली बिल कई गुना बढ़ गए।
- मुंबई में जनता के विरोध के बाद अधिकारियों को स्मार्ट मीटर योजना रोकनी पड़ी।
- पुराने मीटरों के विपरीत, जिन्हें सरकार के वज़न और माप विभाग द्वारा सत्यापित किया जाता था, स्मार्ट मीटरों की जाँच के लिए कोई स्वतंत्र नियामक या ऑडिट तंत्र मौजूद नहीं है।
कॉरपोरेट कंपनियाँ और नीति का परिप्रेक्ष्य
अदाणी एनर्जी सॉल्यूशंस, टाटा पावर, टोरेंट पावर और सीएससी जैसी प्रमुख निजी कंपनियाँ पहले से ही स्मार्ट मीटर और बिजली वितरण परियोजनाओं में शामिल हैं।
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